लगती हैं साँसे येह मद्धम ,
लगता है पूरा भी कुछ कम.
लगती हैं आँखे अब यह नम,
लगती हैं ख़ुशी संजोये गम .
लगता हर लम्हा भारी सा,
लगता उजड़ा फूलवारी सा .
लगता अब भूख न प्यास ही है,
लगता मन बिना पुष्प की क्यारी सा .
लगता है सवेरा धुंधला सा ,
कोहरे की चादर में लिपटा.
लगती हैं शामें धूमिल सी ,
ल्ख्स्मन को खोजे उर्मिल सी.
लगती है लाखों की भीड़ भी यों,
निर्जीव से पत्थर बिखरे ज्यो.
लगती वोह ध्वनियाँ- बातें यों ,
जो चीख रहे ये पत्थर हो.

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