येह जो तेरे स्वप्न हैं ,
वोह हैं तुझे ललकारते.
तू न डर जाए न छिप जाए ,
तुझे हुंकारते .
या छिपी तुझमें कही .
तोह तू भिड जाए उसी से ,
छीन जिसने नींद ली .
करवटे अब न बदल ,
बस ऐ मेरे हमराह तू .
उठा कर तू सस्त्र अपने ,
सर्प सा फुफकार तू .
शक्ति मिलती हैं नहीं ,
उसको जो है बस गिड -गिडाता .
वोह तोह मिलती है उसे ,
जो छीन कर उसको है लाता .
तू भी अपना मान अब ,
सम्मान अपना खुद बना ले .
युद्ध करके विजयी हो ,
या प्राण युद्ध में चढ़ा दे .
डर के जीने पर ये जीवन ,
तू ना जीने पायेगा .
मर भी जायेगा अभी ,
पर मोक्ष तू ना पायेगा .
मोक्ष तो तुझको मिलेगा ,
जब लड़ेगा भय से तू .
भय का सर धड से अलग कर ,
भय को भय दे देगा तू .

No comments:
Post a Comment